ख़ुद-फ़रामोशी में ख़याल कहाँ
मैं कहाँ हसरत-ए-जमाल कहाँ
न वो आँसू हैं और न वो आहें
अब वो अगला सा अपना हाल कहाँ
दिल-ए-वहशी ने सर उठाया है
दूर-अँदेशी-ए-मआल कहाँ
ग़म-ए-दुनिया में सर है सरगर्दां
अब वो नैरंगी-ए-ख़याल कहाँ
अहद-ए-रफ़्ता को भूलना अच्छा
वो ज़माना वो माह-ओ-साल कहाँ
हो शिकायत किसी से ना-मुम्किन
ये जसारत कहाँ मजाल कहाँ
किस तरह दास्तान-ए-ग़म कहे
कोई पुरसान-ए-अर्ज़-ए-हाल कहाँ
— Bano Tahira Sayeed















