पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से

पुकारती है उन्हें मंज़िल-ए-तलब कब से

ये और बात मकीनों को कुछ ख़बर न हुई
लगा रहे थे मुहाफ़िज़ मगर नक़ब कब से

कोई भी हर्बा-ए-तश्हीर कार-गर न हुआ
तमाशबीं ही रही शोहरत-ए-अदब कब से

उखड़ गई हैं तनाबें सितम के ख़ेमों की
उलट गई है बिसात-ए-हसब-नसब कब से

न हौसला है दुआ का न आह पर है यक़ीं
कि हम से रूठ गया है हमारा रब कब से

समुंदरों से कोई मौज-ए-सर-बुलंद उठे
कि साहिलों पे तड़पते हैं जाँ-ब-लब कब से

वो हम ने चुन दिए तन्क़ीद की सलीबों पर
मचल रहे थे जो कुछ हर्फ़ ज़ेर-ए-लब कब से

— Bakhsh Layalpuri

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