क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला

दुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला

मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं कि दिल मिरा
मुझ को सू-ए-मज़ार-ए-शकर गंज ले चला

साक़ी सँभालता है तो जल्दी मुझे सँभाल
वर्ना उड़ा के पाँ नशा-ए-बंज ले चला

दौड़ा के हाथ छाती पे हम उन की यूँ फिरे
जैसे कोई चोर आ के हो नारंज ले चला

चौसर का लुत्फ़ ये है कि जिस वक़्त पो पड़े
हम बर-चहार बोले तो बर-पंज ले चला

जिस दम 'ज़फ़र' ने पढ़ के ग़ज़ल हाथ से रखी
आँखों पे रख हर एक सुख़न-संज ले चला

— Bahadur Shah Zafar

More by Bahadur Shah Zafar

Other ghazal from the same pen

See all from Bahadur Shah Zafar →

Kitaaben Shayari

Shers of kitaaben.

All Kitaaben Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling