इतना न अपने जा

में से बाहर निकल के चल
दुनिया है चल-चलाव का रस्ता संभल के चल

औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल
बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल

इंसां को कल का पुतला बनाया है उस ने आप
और आप ही वो कहता है पुतले को कल के चल

फिर आँखें भी तो दीं हैं कि रख देख कर क़दम
कहता है कौन तुझ को न चल चल संभल के चल

क्या चल सकेगा हम से कि पहचानते हैं हम
तू लाख अपनी चाल को ज़ालिम बदल के चल

है शमा' सर के बल जो मोहब्बत में गर्म हो
परवाना अपने दिल से ये कहता है जल के चल

बुलबुल के होश निकहत-ए-गुल की तरह उड़ा
गुलशन में मेरे साथ ज़रा इत्र मल के चल

गर क़स्द सू-ए-दिल है तिरा ऐ निगाह-ए-यार
दो-चार तीर पैक से आगे अजल के चल

जो इम्तिहान-ए-तबाह करे अपना ऐ 'ज़फ़र'
तो कह दो उस को तौर पे तू इस ग़ज़ल के चल

— Bahadur Shah Zafar

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