फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब

उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाब
आ रहे हैं जंग के बादल वो मंडलाते हुए
आग दामन में छुपाए ख़ून बरसाते हुए
कोह-ओ-सहरा में ज़मीं से ख़ून उबलेगा अभी
रंग के बदले गुलों से ख़ून टपकेगा अभी
बढ़ रहे हैं देख वो मज़दूर दर्राते हुए
इक जुनूँ-अंगेज़ लय में जाने क्या गाते हुए
सर-कशी की तुंद आँधी दम-ब-दम चढ़ती हुई
हर तरफ़ यलग़ार करती हर तरफ़ बढ़ती हुई
भूक के मारे हुए इंसाँ की फ़रियादों के साथ
फ़ाक़ा-मस्तों के जिलौ में ख़ाना-बर्बादों के साथ
ख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ाम
रंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ाम
गिर पड़ेंगे ख़ौफ़ से ऐवान-ए-इशरत के सुतूँ
ख़ून बन जाएगी शीशों में शराब-ए-लाला-गूँ
ख़ून की बू ले के जंगल से हवाएँ आएँगी
ख़ूँ ही ख़ूँ होगा निगाहें जिस तरफ़ भी जाएँगी
झोंपड़ों में ख़ूँ, महल में ख़ूँ, शबिस्तानों में ख़ूँ
दश्त में ख़ूँ, वादियों में ख़ूँ, बयाबानों में ख़ूँ
पुर-सुकूँ सहरा में ख़ूँ, बेताब दरियाओं में ख़ूँ
दैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँ
ख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान में
डूब जाएँगी चटानें ख़ून के तूफ़ान में
ख़ून की रंगीनियों में डूब जाएगी बहार
रेग-ए-सहरा पर नज़र आएँगे लाखों लाला-ज़ार
ख़ून से रंगीं फ़ज़ा-ए-बोस्ताँ हो जाएगी
नर्गिस-ए-मख़मूर चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ हो जाएगी
कोहसारों की तरफ़ से ''सुर्ख़-आंधी'' आएगी

— Asrar Ul Haq Majaz

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