अभी मन भर गया है इस ज़मीं से
मुझे देखो निगाह-ए-वापसीं से
कफ़न पीले कलर का डाल देना
उन्हें दिखता नहीं हूँ मैं कहीं से
वो जब चाहे तुम्हें राजा बना दे
बचे रहिए निगाह-ए-पेश-बीं से
ग़ज़ल में मैं सदा मिलता रहूँगा
निकलकर सोहबत-ए-नाम-ओ-नगीं से
शराफ़त आप की अब दिख चुकी है
पसीना पोंछिए अपनी जबीं से
तरक़्क़ी बस तरक़्क़ी चाहता हूँ
मेरी है दुश्मनी सहरा-नशीं से
मुझे क्या एक दिन मौक़ा मिलेगा
कभी है पूछना अर्श-ए-बरीं से
अधर पर आग रख कर कह रहा हूँ
ज़बाँ भी खुल रही ज़ेर-ए-नगीं से
— Prabhat Adhar















