जीते जी लेता रहा मैं नाम उस का

मरते दम आया नहीं पैग़ाम उस का

उम्र-भर ख़ुद को बताता रह गया मैं
पास जा, फिर हाथ फट से थाम उस का

उफ़ ये बेचैनी ये मेरी छटपटाहट
कर न पाए आज तक इक काम उस का

और मेरी ज़िंदगी में क्या मिलेगा
दर्द आँसू जो भी है इन'आम उस का

आज सब-कुछ हार कर के सोचता हूँ
चल पड़ूँ मैं जिस तरफ़ हैं धाम उस का

— Ankit Dixit

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