जिस तरह हो गए जंगल ख़ामोश

हो रही हूँ मैं मुसलसल ख़ामोश

मुझ में बाक़ी नहीं चिंगारी भी
आग होनी ही थी जल जल ख़ामोश

ख़ास वक़्तों में छलक जाती हूँ मैं
दरिया रहता नहीं हर पल ख़ामोश

और ताख़ीर न कर आने में
हो न जाऊँ मैं मुकम्मल ख़ामोश

कौन आख़िर तुझे समझाए 'सहर'
ऐसे रोते नहीं, पागल, ख़ामोश

— Anjali Sahar

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