हम हैं चढ़ते हुए दरिया में उतरने वाले
हम कहाँ तेज़ हवाओं से हैं डरने वाले
लौट कर आए कोई कुछ तो ख़बर हो हम को
किस जहाँ को चले जाते हैं ये मरने वाले
सौ दफ़ा गिर के उठे, उठ के चले हैं सो हम
सख़्ती-ए-राह से हरगिज़ नहीं डरने वाले
आप जैसे तो कई देखे हैं हम ने लेकिन
आप से बढ़ के नहीं देखे मुकरने वाले
तुम न ज़िद्दी हो न ख़ुद सर न कोई सब्र-ओ-ज़ब्त
ऐसे होते हैं भला हद से गुज़रने वाले
— Anjali Sahar















