उस ने जब भी कभी मोहब्बत की

जैसे मुझ पे कोई इनायत की

डूब जाते हैं अहल-ए-दिल इस
में
मैं वही झील हूँ मोहब्बत की

फिर मेरे रू-ब-रू वो आया है
फिर ख़बर हो गई क़यामत की

होंठ पर होंठ रख दिए मैं ने
क्या ज़रूरत है अब इजाज़त की

जब तेरा लम्स हो गया हासिल
किस को परवाह कोई जन्नत की

ऐसे मंज़िल नहीं मिली मुझ को
मैं ने पाने को ख़ूब मेहनत की

ग़मज़दों ने सजाई थी महफ़िल
और मैं ने वहाँ निज़ामत की

आज़माओ ना तुम 'अनन्या' को
हद होती है इक शराफ़त की

— Ananya Rai Parashar

More by Ananya Rai Parashar

Other ghazal from the same pen

See all from Ananya Rai Parashar →

Valentine Shayari Collection

Shers of valentine shayari collection.

All Valentine Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling