ये दुनिया, दुनिया नइ है इक पिंजरा है
या'नी हर पिंजरे में झूठी दुनिया है
जाने में हर रस्ता लंबा लगता है
आने में पर घर जल्दी आ जाता है
ख़त के ऊपर नाम लिखा है मेरा, पर
पढ़ कर लगता है ग़लती से भेजा है
जिस ने दरिया में बस पत्थर फेंके थे
मैं ने उस के सामने सिक्का फेंका है
मैं समझा था सामने तुम ही बैठी हो
ग़ौर से देखा तब समझा आईना है
तुम मेरे कमरे में रुक सकती हो पर
मेरे कमरे में बस एक ही तकिया है
घर न जाने के तो सौ सौ रस्ते है
घर जाने का लेकिन एक ही रस्ता है
देख रहा हूँ आग लगाकर बारिश में
आग बुझेगी या फिर पानी जलना है
— Anand Verma















