ये दिल आवेज़ी-ए-हयात न हो

अगर आहंग-ए-हादसात न हो

तेरी नाराज़गी क़ुबूल मगर
ये भी क्या भूल कर भी बात न हो

ज़ीस्त में वो घड़ी न आए कि जब
हात में मेरे तेरा हात न हो

हँसने वाले रुला न औरों को
सुब्ह तेरी किसी की रात न हो
इश्क़ भी काम की है चीज़ अगर
यही बस दिल की काएनात न हो

कौन उस की जफ़ा की लाए ताब
गाहे गाहे जो इल्तिफ़ात न हो

रिंद कुछ कर रहे हैं सरगोशी
ज़िक्र-ए-'मुल्ला' से ख़ुश-सिफ़ात न हो

— Anand Narayan Mulla

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