घर आँगन में फैली धूप
पीले रंग में लिपटी धूप
रोज़ किताबें चूमती है
सुब्ह की उजली उजली धूप
हम जब भी स्कूल गए
हम से पहले वहाँ थी धूप
हम न रुकेंगे मंज़िल तक
कैसी बारिश कैसी धूप
धरती सोना लगती है
चमकाए यूँ मिट्टी धूप
ढूँडा था हम ने तो क़लम
बस्ते में से निकली धूप
किरनों की छतरी था
में
'हाफ़िज़' छत पर उतरी धूप
— Amjad Husain Hafiz Karnataki















