ख़याल-ए-यार का सिक्का उछालने में गया

जुनूँ ख़रीता-ए-ज़र था सँभालने में गया

लहू जिगर का हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-दस्त-ए-हिना
जो सौदा सर में था सहरा खँगालने में गया

गुरेज़-पा था बहुत हुस्न-पारा-ए-हस्ती
सो अर्सा उम्र का ज़ंजीर डालने में गया

निहाल यादों की चाँदी में शब तो दिन सारा
किसी के ज़िक्र का सोना उछालने में गया

थी दस्त-गाह बयाँ पर मगर कमाल-ए-हुनर
ग़म-ए-हयात के क़िस्सों को टालने में गया

— Amir Hamza Saqib

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