बदन के लुक़्मा-ए-तर को हराम कर लिया है

कि ख़्वान-ए-रूह पे जब से तआम कर लिया है

बताओ उड़ती है बाज़ार-ए-जाँ में ख़ाक बहुत
बताओ क्या हमें अपना ग़ुलाम कर लिया है

ये आस्ताना-ए-हसरत है हम भी जानते हैं
दिया जला दिया है और सलाम कर लिया है

मकाँ उजाड़ था और ला-मकाँ की ख़्वाहिश थी
सो अपने आप से बाहर क़याम कर लिया है

बस अब तमाम हो ये वहम ओ ए'तिबार का खेल
बिसात उलट दी सभी सारा काम कर लिया है

किसी से ख़्वाहिश-ए-गुफ़्तार थी मगर 'साक़िब'
वुफ़ूर-ए-शौक़ में ख़ुद से कलाम कर लिया है

— Amir Hamza Saqib

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Anjam Shayari

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