ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है

नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है

नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को
ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है

नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती
कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है

ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का
जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है

— Amir Ameer

More by Amir Ameer

Other ghazal from the same pen

See all from Amir Ameer →

Waqt Shayari

Shers of waqt.

All Waqt Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling