तज्दीद ज़िंदगी के इशारे हुए तो हैं
कुछ पल सही वो आज हमारे हुए तो हैं
माना नसीब हो न सका कोई आफ़्ताब
रातों में मेरी चाँद सितारे हुए तो हैं
बे-शक हक़ीक़तों से बहुत दूर है मगर
बे-शक यही सराब सहारे हुए तो हैं
छूटा नहीं है दामन-ए-उम्मीद अब तलक
हम भी ऐ दोस्त वक़्त के मारे हुए तो हैं
ये और बात हम ही न महज़ूज़ हो सके
ख़ुश-रंग ज़िंदगी के नज़ारे हुए तो हैं
— Ameeta Parsuram Meeta















