मोहब्बत मेहरबाँ तेरी न मेरी

मुकम्मल दास्ताँ तेरी न मेरी

गँवा दी उम्र जिस को जीतने में
वो दुनिया मेरी जाँ तेरी न मेरी

ख़ुदा जाने है किस का दर्द कितना
ये साँझी सिसकियाँ तेरी न मेरी

हैं ना-इंसाफ़ियाँ हर सम्त लेकिन
खुली अब तक ज़बाँ तेरी न मेरी

बचा है और न कोई बच सकेगा
ग़मों की आँधियाँ तेरी न मेरी

तू जितना भी उन्हें अपना समझ ले
सियासी हस्तियाँ तेरी न मेरी

सहाफ़त को ख़रीदा अहल-ए-ज़र ने
रही अब सुर्ख़ियाँ तेरी न मेरी

अदाकारी रिया-कारी दिखावा
हक़ीक़त की ज़बाँ तेरी न मेरी

— Ameeta Parsuram Meeta

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