रास्ता चलते हुए दो हम-क़दम ग़ुस्से में है

हम से दुनिया और इस दुनिया से हम ग़ुस्से में है

लिख नहीं पाती जो लिखना चाहती हैं उँगलियाँ
क्या हुआ जाने के हाथों से क़लम ग़ुस्से में है

मुस्कुरा बैठे हैं तुझ को मुस्कुराता देख कर
वरना तेरी मुस्कराहट की क़सम ग़ुस्से में है

आ रहा है इक रसूल-ए-हुस्न आई है ख़बर
काबा-ए-दिल में रखे सारे सनम ग़ुस्से में है

मेरी साँसों ने जो उन का बढ़ के बोसा ले लिया
काकुलें ग़ुस्से में हैं जुल्फ़ों के ख़म ग़ुस्से में है

अच्छा लगता है बहुत कहते हैं हम से लोग जब
वो भी ग़ुस्से में है लेकिन तुम से कम ग़ुस्से में है

— Ameer Imam

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