आज वो फूल बना हुस्न-ए-दिल-आरा देखा

सच हुआ पिछले बरस जो भी कहा था देखा

ध्यान में लाए तसव्वुर में बसाया देखा
इतना ही अजनबी पाया उसे जितना देखा

किस वसीले से भला अर्ज़-ए-तमन्ना करते
हम ने जिस वक़्त भी देखा उसे तन्हा देखा

कब से एहसास पे इक बोझ लिए फिरते हैं
काश पूछो कि भरी बज़्म में क्या क्या देखा

शाह-राहों के घने पेड़ कटे हैं जब से
चौंक उट्ठे हैं जहाँ अपना भी साया देखा

दफ़्अ'तन आ गया फिर डूबते सूरज का ख़याल
शाम के वक़्त जो दरिया का किनारा देखा

— Ameen Rahat Chugtai

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