ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं

हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा
हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं

गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना
गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं

रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल
हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं

उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब
कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं

जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग
वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं

बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन
अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं

— Allama Iqbal

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