ये बेकस-ओ-बेक़रार चेहरे

सदियों के ये सोगवार चेहरे

मिट्टी में पड़े दमक रहे हैं
हीरों की तरह हज़ार चेहरे

ले जा के इन्हें कहाँ सजाएँ
ये भूक के शिकार चेहरे

अफ़्रीक़ा-ओ-एशिया की ज़ीनत
ये नादिर-ए-रोज़गार चेहरे

खोई हुई अज़्मतों के वारिस
कल रात के यादगार चेहरे

ग़ाज़े से सफ़ेद मय से रंगीं
इस दौर के दाग़दार चेहरे

गुज़रे हैं निगाह-ओ-दिल से हो कर
हर तरह के बे-शुमार चेहरे

मग़रूर अना के घोंसले में
बैठे हुए कम-अयार चेहरे

काबिल-ए-इल्तिफ़ात आँखें
ना-क़ाबिल-ए-ए'तिबार चेहरे

इन सब से हसीन-तर हैं लेकिन
रिंदों के गुनाहगार चेहरे

— Ali Sardar Jafri

More by Ali Sardar Jafri

Other ghazal from the same pen

See all from Ali Sardar Jafri →

Khuddari

Shers of khuddari.

All Khuddari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling