वही हुस्न-ए-यार में है वही लाला-ज़ार में है

वो जो कैफ़ियत नशे की मय-ए-ख़ुश-गवार में है

ये चमन की आरज़ू है कोई लूट ले चमन को
ये तमाम रंग-ओ-निकहत तिरे इख़्तियार में है

तिरे हाथ की बुलंदी में फ़रोग़-ए-कहकशाँ है
ये हुजूम-ए-माह-ओ-अंजुम तिरे इंतिज़ार में है

बस उसी को तोड़ना है ये जुनून-ए-नफ़अ'-ख़ोरी
यही एक सर्द ख़ंजर दिल-ए-रोज़गार में है

अभी ज़िंदगी हसीं है अभी ज़िक्र-ए-मौत कैसा
अभी फूल खिल रहे हैं अभी तो कनार में है

अभी मय-कदा जवाँ है अभी मौज में है साक़ी
अभी जाम रक़्स में है अभी मय बहार में है

यही मेरा शेर-ओ-नग़्मा यही मेरी फिक्र-ओ-हिकमत
जो सुरूर-ओ-दर्द-मंदी दिल-ए-बे-क़रार में है

— Ali Sardar Jafri

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