तिरे हाथों में जब हो हाथ तो हम-ज़ोर लगता है

मगर जब साथ चलना हो मिरा क्यूँ ज़ोर लगता है

मोहब्बत के मज़ाहिब में सुनो दोनों ही काफ़िर हैं
तिरा ईमाँ मुझे मेरा तुझे कमज़ोर लगता है

असर कुछ हादसों का यूँ पड़ा मेरी समाअ'त पर
किसी का धीमा लहजा भी मुझे अब शोर लगता है

सुनो इंसान जो इंसानियत से दूर रहता हो
मुझे इंसाँ नहीं लगता वो आदम-ख़ोर लगता है

हमारे दो दिलों के दरमियाँ सरहद है नफ़रत की
वगर्ना साथ अमृतसर ही के लाहौर लगता है

ये जिस शोहरत को तुम इज़्ज़त गँवा कर मो'तबर समझे
कि इज़्ज़त को कमाने में सुनो इक दौर लगता है

ग़ज़ल सारी ही तेरी ठीक है अपनी जगह लेकिन
मुझे मतले' का सानी बस ज़रा कमज़ोर लगता है

हुनर है आप का दिल जीत लेना झूटी बातों से
'रज़ी' सच्ची सुनाता है तभी मुँह-ज़ोर लगता है

— Ali Raza Razi

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