में पेट से अपने ख़ुद ही कपड़ा उठा रहा हूँ बता रहा हूँ

मैं अपने बच्चों को आज भूका सुला रहा हूँ बता रहा हूँ

बिसात से बढ़ के ख़र्च ख़ुद को किया है मैं ने मिरी ख़ता है
और अब मैं चादर से पाँव अपने छुपा रहा हूँ बता रहा हूँ

अना को अपनी मैं अपने हाथों से हार दूँगा या मार दूँगा
ग़ुरूर को अपने ख़ाक में भी मिला रहा हूँ बता रहा हूँ

मैं ज़ब्त की आख़िरी हदों को न जा सकूँगा मैं रो पड़ूँगा
मैं बात करते हुए तभी कपकपा रहा हूँ बता रहा हूँ

ये ख़ुश-लिबासी ये रख-रखाव सिवा दिखावे के कुछ नहीं है
मैं एक टोपी ही सब के सर पे घुमा रहा हूँ बता रहा हूँ

मैं ज़ुल्मत-ए-शब का शिकवा हरगिज़ नहीं करूँगा डटा रहूँगा
मैं अपने हिस्से की शम्अ'' यारो जला रहा हूँ बता रहा हूँ

मैं जानता हूँ जवाब तेरा नहीं में होगा अजीब क्या है
सवाल करते हुए तभी हिचकिचा रहा हूँ बता रहा हूँ

मुझे तो सब कुछ ही याद है मैं सहर का भूला नहीं हूँ यारो
मैं शाम ढलने से पहले ही घर को जा रहा हूँ बता रहा हूँ

ले मेरी जानिब से आज बदले की इंतिहा सुन मिरा ऐलाँ सुन
मैं अपनी नज़रों से आज तुझ को गिरा रहा हूँ बता रहा हूँ

वजूद मेरा है ख़ाक और इस ने ख़ाक में ही है ख़ाक होना
मैं ख़ाक को आसमाँ की जानिब उड़ा रहा हूँ बता रहा हूँ

ये शे'र तो मुझ से बैठे बैठे यूँही हुए हैं कहे नहीं हैं
'रज़ी' मैं मिसरे के साथ मिस्रा लगा रहा हूँ बता रहा हूँ

— Ali Raza Razi

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