लब जो देखे तिश्नगी तड़पा गई
फिर निगाह-ए-नाज़ हम को खा गई
हम अभी आँखों से लब तक आए थे
बात इतनी थी कि वो शर्मा गई
था अगर पत्थर का मेरा दिल तो फिर
तेरी क़ुर्बत क्यूँ उसे पिघला गई
उस ने आँखों से धमाका कर दिया
दिल पे दहशत-गर्द लड़की छा गई
था अभी पहली मोहब्बत का ख़ुमार
एक फिर जाम-ए-शहादत पा गई
दिल को न सर पर चढ़ाऊँगा मैं अब
ये मोहब्बत अब समझ में आ गई
— Ali Raza Razi















