दिलों में घर बनाना आ गया है

तुम्हें मिलना मिलाना आ गया है

गए हो सीख मुँह पे झूट कहना
तुम्हें अब सच छुपाना आ गया है

तुम्हारे मुँह में ये शोहरत की हड्डी
तुम्हें भी दुम हिलाना आ गया है

सुना है शे'र कहने लग पड़े हो
तुम्हें मिस्रा लगाना आ गया है

पुरानी इक ग़ज़ल का शे'र पढ़ कर
तुम्हें महफ़िल उठाना आ गया है

नहीं सच की कोई वक़अत यहाँ पर
ख़ुदाया क्या ज़माना आ गया है

जो अपने फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल रहे थे
उन्हें अब हक़ जताना आ गया है

तुम्हारी मुस्कुराहट कह रही है
तुम्हें भी ग़म छुपाना आ गया है

उठानी आ गई दीवार तुम को
हमें भी दर बनाना आ गया है

मिरे लब पर दुआ है रब्ब-ए-ज़िदनी
ख़ज़ाना ग़ाएबाना आ गया है

'रज़ी' जी भाड़ में जाए मोहब्बत
हमें अब दिल जलाना आ गया है

— Ali Raza Razi

More by Ali Raza Razi

Other ghazal from the same pen

See all from Ali Raza Razi →

Wahshat Shayari

Shers of wahshat.

All Wahshat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling