जफ़ा की रस्म-ए-सितम का रिवाज बदलेगा

फ़क़ीह-ए-शहर का आख़िर मिज़ाज बदलेगा

मैं जानता हूँ बदलती रुतों की ख़ुश्बू से
हवा-ए-दश्त तिरा इम्तिज़ाज बदलेगा

जुमूद-ए-मर्ग नुमूद अस्ल ज़िंदगी है तो फिर
जो कल न बदला यक़ीनन वो आज बदलेगा

ख़ुलूस-ओ-मेहर-ओ-वफ़ा ख़्वाब हो गए जैसे
न जाने कब ये नहूसत का राज बदलेगा

नए शुऊ'र के चर्चे हैं चार सू 'अख़्तर'
मुझे यक़ीं है ये कोहना समाज बदलेगा

— Akhtar Ziai

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Faith Shayari

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