जाँ रहे या न रहे नाम रहे
साथियो रस्म-ए-जुनूँ आम रहे
बारहा सई-ए-तलब की हम ने
ये अलग बात कि नाकाम रहे
अज़्मत-ए-इश्क़ से ना-वाक़िफ़ थे
जो असीर-ए-हवस-ए-ख़ाम रहे
क्या तअ'ज्जुब है कि पीरान-ए-हरम
मर के भी तालिब-ए-असनाम रहे
क्या ख़बर है कि यूँ ही ऐ 'अख़्तर'
ता-ब-कै गर्दिश-ए-अय्याम रहे
— Akhtar Ziai















