हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए

ये दिल मलूल था आज़ार से निकलते हुए

बड़ी ही देर तलक धूप मुझ को छू न सकी
तुम्हारे साया-ए-दीवार से निकलते हुए

कि फिर से तख़्त को आना था मेरे क़दमों में
मैं पुर-यक़ीन था दरबार से निकलते हुए

शुआ-ए-नूर के फूटे से जाँ लरज़ती थी
तुम्हारी गर्मी-ए-रुख़्सार से निकलते हुए

तुम्हारे ध्यान में गुम हो गई थी महकी हवा
हुदूद-ए-जादा-ए-गुलज़ार से निकलते हुए

मैं लौट आया तुझे छोड़ कर मगर आधा
वहीं रहा दर-ओ-दीवार से निकलते हुए

फ़ज़ा में देर तलक ख़ूब जगमगाते 'शुमार'
वो लफ़्ज़ शोख़ी-ए-गुफ़्तार से निकलते हुए

— Akhtar Shumar

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Garmi Shayari

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