गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल की तरह गो शाद हैं हम शादाब हैं हम

कहती है ये हँस कर सुब्ह-ए-ख़िज़ाँ सब नाज़-ए-अबस इक ख़्वाब हैं हम

किस माह-ए-लक़ा के इश्क़ में यूँ बेचैन हैं हम बेताब हैं हम
किरनों की तरह आवारा हैं हम तारों की तरह बे-ख़्वाब हैं हम

मिट जाने पे भी मसरूर हैं हम मुरझाने पे भी शादाब हैं हम
शहबा-ए-शबाब-ओ-इश्क़ का इक भूला हुआ रंगीं ख़्वाब हैं हम

फ़ितरत के जमाल-ए-रंगीं से हम ने भी उठाए हैं पर्दे
बरबत है अगर फ़िरदौस-ए-जहाँ तो इस के लिए मिज़राब हैं हम

ख़ुश-वक़्ती है वज्ह-ए-रंज-ओ-अलम गुलज़ार-ए-जहाँ में ऐ हमदम
ताइर न पुकारें शाद हैं हम ग़ुंचे न कहें शादाब हैं हम

मिलने पे गर आएँ कोई मकाँ ख़ाली नहीं अपने जल्वों से
और गोशा-नशीं हो जाएँ अगर कमयाब नहीं नायाब हैं हम

दो दिन के लिए हम आए हैं इक शब की जवानी लाए हैं
फ़िरदौस-ए-सरा-ए-हस्ती में हम रंग-ए-गुल-ए-महताब हैं हम

रुसवाई-ए-शेर-ओ-इश्क़ ने वो रुत्बा हमें 'अख़्तर' बख़्शा है
फ़ख़्र-ए-दकन-ओ-बंगाल हैं हम नाज़-ए-अवध-ओ-पंजाब हैं हम

— Akhtar Shirani

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