मौज-ए-शमीम हैं न ख़िराम-ए-सबा हैं हम

ठहरी हुई गुलों के लबों पर दुआ हैं हम

बेगाना ख़ल्क़ से हैं न तुझ से ख़फ़ा हैं हम
ऐ ज़िंदगी मुआ'फ़ कि दैर-आश्ना हैं हम

इस राज़ को भी फ़ाश कर ऐ चश्म-ए-दिल-नवाज़
काँटा खटक रहा है ये दिल में कि क्या हैं हम

यारब तिरा कमाल-ए-हुनर हम पे ख़त्म है
या सिर्फ़ मश्क़-ए-नाज़ का इक तजरबा हैं हम

आख़िर तिरे सुलूक ने झुटला दिया इसे
इक ज़ो'म था हमीं कि सरापा वफ़ा हैं हम

कल इस ज़मीं पे उतरेंगे फूलों के क़ाफ़िले
इक पैकर-ए-बहार की आवाज़-ए-पा हैं हम

— Akhtar Saeed Khan

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