कोई मुझ से जुदा हुआ है अभी
ज़िंदगी एक सानेहा है अभी
नहीं मौक़ा ये पुर्सिश-ए-ग़म का
देखिए दिल दुखा हुआ है अभी
कल गुज़र जाए दिल पे क्या मालूम इश्क़ सादा सा वाक़िआ'' है अभी
बात पहुँची है इक नज़र में कहाँ
हम तो समझे थे इब्तिदा है अभी
कितने नज़दीक आ गए हैं वो
किस क़दर उन से फ़ासला है अभी
सारी बातें ये ख़्वाब की सी हैं
ज़िंदगी दूर की सदा है अभी
दार पर खींचते हैं 'अख़्तर' को
जुर्म ये है कि जी रहा है अभी
— Akhtar Saeed Khan















