चंद उलझी हुई साँसों की अता हूँ क्या हूँ

मैं चराग़-ए-तह-ए-दामान-ए-सबा हूँ क्या हूँ

हर नफ़स है मिरा पर्वर्दा-ए-आग़ोश-ए-बला
अपने ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा हूँ क्या हूँ

मुझ पे खुलता ही नहीं मेरा सितम-दीदा वजूद
कोई पत्थर हूँ कि गुम-कर्दा सदा हूँ क्या हूँ

दिल में हूँ और ज़बाँ पर कभी आता भी नहीं
मैं कोई भोला हुआ हर्फ़-ए-दुआ हूँ क्या हूँ

मैं सफ़र में हूँ मगर सम्त-ए-सफ़र कोई नहीं
क्या मैं ख़ुद अपना ही नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हूँ क्या हूँ

मैं ने देखा ही नहीं जागती आँखों से कभी
कोई उक़्दा हूँ कि ख़ुद उक़्दा-कुशा हूँ क्या हूँ

पूछता है मिरा पैराहन-ए-हस्ती मुझ से
मैं क़बा हूँ कि फ़क़त बंद-ए-क़बा हूँ क्या हूँ

दिल की और मेरी ज़बाँ एक है फिर भी 'अख़्तर'
लफ़्ज़ ओ मअ'नी की पुर-असरार फ़ज़ा हूँ क्या हूँ

— Akhtar Saeed Khan

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