तुझ से मिलने की आरज़ू है बहुत
इस लिए तेरी जुस्तुजू है बहुत
ज़िंदगी के निगार-ख़ाने में
एक मैं और एक तू है बहुत
नासेह-ए-मोहतरम ख़ुदा-हाफ़िज़
आज इतनी ही गुफ़्तुगू है बहुत
गर्दिश-ए-वक़्त तुझ से लड़ने को
इन रगों में अभी लहू है बहुत
सारी दुनिया की बेटियाँ सुन लें
इस ग़रीबी में आबरू है बहुत
— Akhtar Gwaliori















