फूल जलते हैं कहीं बर्ग-ओ-समर जलते हैं

फ़स्ल-ए-गुल आई है बाग़ों में शजर जलते हैं

अल्लह अल्लाह जबीन-ए-रुख़-ए-जानाँ की तपिश
ऐसा लगता है कि अब शम्स-ओ-क़मर जलते हैं

क्या ग़ज़ब है कि तिरे शहर में ऐ जान-ए-ग़ज़ल
जिस्म-ओ-जाँ ज़ेहन-ओ-नज़र क़ल्ब-ओ-जिगर जलते हैं

जिस तरफ़ देखिए इक आग का दरिया है रवाँ
रास्ते ख़ून में डूबे हैं नगर जलते हैं

बुझ चुका हूँ मैं मगर अब भी मिरे नक़्श-ए-क़दम
देख लो जा के सर-ए-राहगुज़र जलते हैं

जिन के सीनों में फ़रोज़ाँ है वफ़ा की शमएँ
रोज़-ओ-शब जलते हैं वो शाम-ओ-सहर जलते हैं

आप जिस शहर को पुर-अम्न समझते हैं हुज़ूर
वाक़िआ''' ये है उसी शहर में घर जलते हैं

दफ़्अ'तन नींद से मैं चौंक उठा ऐ 'अख़्तर'
मैं ने जब ख़्वाब में देखा कि हुनर जलते हैं

— Akhtar Gwaliori

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