सुनने वाले फ़साना तेरा है
सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयाँ ही मेरा है
यास की तीरगी ने घेरा है
हर तरफ़ हौल-नाक अँधेरा है
इस में कोई मिरा शरीक नहीं
मेरा दुख आह सिर्फ़ मेरा है
चाँदनी चाँदनी नहीं 'अख़्तर'
रात की गोद में सवेरा है
— Akhtar Ansari
सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयाँ ही मेरा है
यास की तीरगी ने घेरा है
हर तरफ़ हौल-नाक अँधेरा है
इस में कोई मिरा शरीक नहीं
मेरा दुख आह सिर्फ़ मेरा है
चाँदनी चाँदनी नहीं 'अख़्तर'
रात की गोद में सवेरा है
Other ghazal from the same pen
Shers of dard.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling