जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी

हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-अलम भी नीश-ए-ग़म का पास भी

ख़ाक दर-बर ही सही मैं ख़ाक भी वो ख़ाक है
जिस में मेरे ज़ख़्म-ए-दिल की बू भी है और बास भी

कितने दौर-ए-चर्ख़ उन आँखों ने देखे कुछ न पूछ
मिट चुका है वक़्त की रफ़्तार का एहसास भी

हाए वो इक नश्तर-आगीं नेश्तर-अफ़रोज़ याद
जिस के आगे हेच अपनी बुर्रिश-ए-इंफ़ास भी

हम न थे कुछ ख़ुद ही उस सौदे पे राज़ी वर्ना यूँ
रास आने को ये दुनिया आ ही जाती रास भी

ख़ुद को ऐ दिल यास-ए-कामिल के हवाले यूँ न कर
झाँकती है ज़ेहन के ग़ुर्फ़े से कोई आस भी

कौन उस वादी से उछला ता-सर-ए-अर्श-ए-बरीं
गुम हैं जिस वादी में 'अख़्तर' ख़िज़्र भी इल्यास भी

— Akhtar Ansari

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