एक वही मा'मूल निभाना होगा फिर

ख़ुद को खो कर ख़ुद को पाना होगा फिर

राह-गुज़र तन्हाई की है ध्यान रहे
रस्ते में ही एक ज़माना होगा फिर

राह भटक जाओ अब के ये मुमकिन है
पर इस जंगल में से जाना होगा फिर

जिन की आसानी ही जिन की मुश्किल है
उन लफ़्ज़ों को ही दोहराना होगा फिर

वो फलदार दरख़्त गिराया आँधी ने
उन का अब किस ओर निशाना होगा फिर

आज तो उस से मेरी रातें रौशन हैं
कल को जब ये ज़ख़्म पुराना होगा फिर

कब सोचा था चुप्पी बोलेगी ऐसे
आवाज़ों से यूँ वीराना होगा फिर

सहरा में जो ख़ाक उड़ी है बे-मौसम
देखो तो वो ही दीवाना होगा फिर

— Akhilesh Tiwari

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