तू ने ये भी कभी सोचा कि कहाँ रहता है
जो तेरे शहर में बे-नाम-ओ-निशाँ रहता है
अब भी इक अक्स पस-ए-वहम-ओ-गुमाँ है मौजूद
अब भी इक नक़्श सर-ए-आब-ए-रवाँ रहता है
तेरी इक बात है रक्खे हुए हम को वरना
आब-ओ-दाने के लिए कौन यहाँ रहता है
मुतमइन यूँ हैं कि इस ख़ाक की वीरानी में
एक हम ही तो नहीं सारा जहाँ रहता है
यूँ भी होता है कि वो पास ही होता है कहीं
उम्र भर जिस के न होने का गुमाँ रहता है
— Akbar Masoom















