कहकशाँ के तनाज़ुर में हम क्या हमारा सितारा है क्या

अन-गिनत आफ़्ताबों की अक़्लीम में इक शरारा है क्या

कौन समझे ज़बाँ बर्ग-ओ-अश्जार की दश्त-ओ-कोहसार की
कौन जाने कि इस बे-कराँ ख़ामुशी में इशारा है क्या

हम मोहब्बत को इक मंसब-ए-आशिक़ाना समझते रहे
ये न सोचा मोहब्बत की सौदागरी में ख़सारा है क्या

ये तिलिस्म-ए-तमाशा है सारा जहाँ इक तिलिस्म-ए-नज़र
रौशनी का समुंदर हैं आँखें मगर आश्कारा है क्या

वो है बे-मिस्ल उस को उसी के हवाले से समझा करो
उस के इदराक में दख़्ल-ए-तश्बीह क्या इस्तिआ'रा है क्या

एक मिट्टी के घर में जिए उम्र भर और मिट्टी हुए
कुल जहाँ यूँ तो 'अकबर' हमारे लिए पर हमारा है क्या

— Akbar Hyderabadi

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