शरार-ए-संग जो इस शोर-ओ-शर से निकलेगा

जलूस-ए-लाला-ओ-नस्रीं किधर से निकलेगा

मैं जानता हूँ कि उस की ख़बर न आएगी
तनाज़ुर उस का मगर हर ख़बर से निकलेगा

सभी असीर हुए अपनी अपनी सुब्हों के
वो कोई होगा जो क़ैद-ए-सहरस निकलेगा

किसी को अपने सिवा कुछ नज़र नहीं आता
जो दीदा-वर है तिलिस्म-ए-नज़र से निकलेगा

जलाल-ए-हुस्न दिखा मेरे माहताब-ए-जमाल
तू रौशनी है शबों के असर से निकलेगा

शबों को जागते हो जिस के ख़्वाब में 'अकबर'
वो शाहकार कमाल-ए-हुनर से निकलेगा

— Akbar Hameedi

More by Akbar Hameedi

Other ghazal from the same pen

See all from Akbar Hameedi →

Nazar Shayari

Shers of nazar.

All Nazar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling