बहुत लगता बुरा है क़हक़हा मुझ को
न जाने हो गया है दोस्त क्या मुझ को
उसे कहना कि उस के बा'द जाने के
सिवा उस के नहीं कुछ भी दिखा मुझ को
मैं तो हर मसअला उस का समझता हूँ
समझता है मगर वो मसअला मुझ को
निकलते हैं तेरे ही फूल यादों के
रखे है इक शजर यूँ भी हरा मुझ को
समुंदर पार करना है जुदाई का
मेरी ही ले न डूबे ये अना मुझ को
— AKASH















