AKASH
AKASH
Ghazal

अब अकेलेपन से अपने दोस्ती कर के

कमरे में रहता हूँ तन्हा तीरगी कर के

आँखों से आँसू निकल आए ये मुमकिन है
पर हँसा सकते नहीं हो गुदगुदी कर के

झूठ वाले वो तो बेहद बढ़ गए आगे
फँस गया हूँ सच तेरी मैं पैरवी कर के

यादों का उस की ख़ज़ाना पास है मेरे
छीन ले कोई मेरे आगे छुरी कर के

हाईवे पर बैठ कर ये सोचता हूँ मैं
दर्द कम हो जाएगा क्या ख़ुद-कुशी कर के

मश्वरा उस को जिसे सुनता नहीं कोई
गुफ़्तुगू दीवार से देखे कभी कर के

— AKASH

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