मैं जितना भी कमाता हूँ

मैं ज़्यादा ही गँवाता हूँ

मैं लिखकर मौत काग़ज़ पर
मैं उस काग़ज़ को खाता हूँ

जो बारिश आते टूटा हो
मैं इक ऐसा ही छाता हूँ

मैं बस ग़ज़लों को सुनता हूँ
मैं सब ग़ज़लों को भाता हूँ

शब-ए-फ़ुर्क़त सुनानी है
शब-ए-फ़ुर्क़त सुनाता हूँ

तू जितना भी कमाता है
मैं उतना तो उड़ाता हूँ

— Jonty nain

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