दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से उम्र भर बेताब था
कश्ती-ए-दिल का मुक़द्दर पुर-ख़तर गिर्दाब था
वाँ कि आरिज़ सुर्ख़ था रंग-ए-तिला-ए-नाब से
याँ वुफ़ूर-ए-अश्क से मिज़्गाँ मिरा सीमाब था
जैसे खोजे काफ़िरों में निकहत-ए-ईमाँ कोई
हासिल-ए-हक़ इस जहाँ में इस क़दर नायाब था
वाँ कि उस को नींद मिस्ल-ए-मग़्फ़िरत हासिल रही
याँ कोई आज़ुर्दगी से ता-क़ज़ा बे-ख़्वाब था
जब लिखा दिल का फ़साना बह गया काग़ज़ कहीं
अश्क थे इतने रवाँ मेरा क़लम पुर-आब था
शे'र ऐसे कह के भी हासिल मिरा गुम-नाम है
वर्ना मेरा ये हुनर तो क़ाबिल-ए-अलक़ाब था
— Ajay Sahaab















