तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात ही नहीं

ख़ता मुआ'फ़ ये तुम्हारे बस की बात ही नहीं

ग़ज़ल फ़ज़ा भी ढूँडती है अपने ख़ास रंग की
हमारा मसअला फ़क़त क़लम दवात ही नहीं

हमारी साअ'तों के हिस्सा-दार और लोग हैं
हमारे सामने फ़क़त हमारी ज़ात ही नहीं

वरक़ वरक़ पे डाइरी में आँसुओं का नम भी है
ये सिर्फ़ बारिशों से भीगे काग़ज़ात ही नहीं

कहानियों का रूप दे के हम जिन्हें सुना सकें
हमारी ज़िंदगी में ऐसे वाक़िआत ही नहीं

किसी का नाम आ गया था यूँही दरमियान में
अब इस का ज़िक्र क्या करें जब ऐसी बात ही नहीं

— Aitbar Sajid

More by Aitbar Sajid

Other ghazal from the same pen

See all from Aitbar Sajid →

Life Shayari

Shers of life.

All Life Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling