बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ

सच्ची हैं ये रिफ़ाक़तें बाक़ी हैं सब कहानियाँ

ख़े
में उखड़ उजड़ गए ऐसी हवा-ए-शब चली
किरनें ज़मीं पे लिख गईं कैसी अजब कहानियाँ

वुसअत-ए-दश्त के मकीं वादी में कूच कर गए
शाख़ों पे बर्फ़ लिख गई नग़्मा-ब-लब कहानियाँ

चाँद की ख़ाक आ गई पैरों तले हयात के
ऐसी कठिन रिवायतें ऐसी कढब कहानियाँ

जौहर-ए-हक़ नहीं मिला मुझ को किसी किताब में
मिट्टी से सुन रहा हूँ मैं आली-नसब कहानियाँ

वुसअत-ए-कोह-ओ-दश्त हो शहर ओ नगर का गश्त हो
मेरा सफ़र हिकायतें मेरा अदब कहानियाँ

शहरों को क्या ख़बर कि मैं कौन हूँ किस फ़ज़ा में हूँ
लिखनी हैं एक दिन मुझे सब्र-तलब कहानियाँ

— Aitbar Sajid

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