कैसे उन्हें भुलाऊँ मोहब्बत जिन्हों ने की

मुझ को तो वो भी याद हैं नफ़रत जिन्हों ने की

दुनिया में एहतिराम के क़ाबिल वो लोग हैं
ऐ ज़िल्लत-ए-वफ़ा तिरी इज़्ज़त जिन्हों ने की

तज़ईन-ए-काएनात का बाइस वही बने
दुनिया से इख़्तिलाफ़ की जुरअत जिन्हों ने की

आसूदगान-ए-मंजि़ल-ए-लैला उदास हैं
अच्छे रहे न तय ये मसाफ़त जिन्हों ने की

अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील
वो भी हुए ख़राब, मोहब्बत जिन्हों ने की

— Ahmad Mushtaq

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