आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना

याद कर ऐ दिल-ए-ख़ामोश वो अपना रोना

रक़्स करना कभी ख़्वाबों के शबिस्तानों में
कभी यादों के सुतूनों से लिपटना रोना

तुझ से सीखे कोई रोने का सलीक़ा ऐ अब्र
कहीं क़तरा न गिराना कहीं दरिया रोना

रस्म-ए-दुनिया भी वही राह-ए-तमन्ना भी वही
वही मिल बैठ के हँसना वही तन्हा रोना

ये तिरा तौर समझ में नहीं आया 'मुश्ताक़'
कभी हँसते चले जाना कभी इतना रोना

— Ahmad Mushtaq

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